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भारतीय राजव्यवस्था - राज्य के नीति निदेशक तत्व ✍️- राज्य नीति के निदेशक तत्वों का उल्लेख संविधान के भाग चार के अनुच्छेद 36 से 51 तक में किया गया है। संविधान निर्माताओं ने यह विचार 1937 में निर्मित आयरलैंड के संविधान से लिया। आयरलैंड के संविधान में इसे स्पेन के संविधान से ग्रहण किया गया था। ✍️- डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इन तत्व को ‘विशेषता’ वाला बताया है। मूल अधिकारों के साथ निदेशक तत्व संविधान की आत्मा एवं दर्शन हैं। ✍️- राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों की अवधारणा का स्रोत स्पेनिश संविधान है जहाँ से यह आयरिश संविधान में आया था। ✍️- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 37 निदेशक सिद्धांतों के कार्यों के बारे में अवगत करता है। इन सिद्धांतों का उद्देश्य लोगों के लिये सामाजिक-आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना और भारत को एक कल्याणकारी राज्य के रूप में स्थापित करना है। नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति अनुच्छेद 37 से स्पष्ट होती है। इसके मुख्य पक्ष निम्नलिखित हैं – 1.नीति निदेशक तत्वो के उपबंध न्यायालयों द्वारा लागू (Enforceable) नहीं हैं। 2.तथापि इसके सिध्दांत देश के संचालन में मूलभूत (Fundamental) हैं। 3.राज्य का यह कर्तव्य है कि वह इन सिध्दांतों को कानून बनाकर लागू करे। ✍️- भारतीय संविधान मे सम्मिलित नीति निदेशक तत्वों की प्रेरणा हमें वर्ष 1937 के आयरलैंड के संविधान से प्राप्त हुई। आयरलैंड के संविधान से अनुसरणीय इस भाग पर फेबियनवाद, समाजवाद, उदार लोकतांत्रिक विचारधाराओं, गांधीवाद, मानवाधिकारों की सार्वत्रिक घोषणाओं आदि का व्यापक प्रभाव पड़ा है। ✍️- ग्रेनविल ऑस्टिन ने निदेशक तत्व और अधिकारों को संविधान की मूल आत्मा कहा है। ✍️- निदेशक तत्वों की प्रकृति गैर-न्यायोचित है। यानी कि उनके हनन पर उन्हें न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता। अतः सरकार (केंद्र राज्य एवं स्थानीय) इन्हें लागू करने के लिए बाध्य नहीं हैं। ✍️- यद्पि निदेशक तत्वों की प्रकृति गैर-न्यायोचित है तथापि कानून की संवैधानक मान्यता के विवरण में न्यायालय इन्हें देखता है। उच्चतम न्यायालय ने कई बार व्यवस्था दी है कि किसी विधि की सांविधानिकता का निर्धारण करते समय यदि न्यायालय यह पाए कि प्रश्नगत विधि निदेशक तत्व को प्रभावी करना चाहती है तो न्यायालय ऐसी विधि को अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 के संबंध में तर्कसंगत मानते हुए असंविधानिकता से बचा सकता है।